भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात को रोकने के अमेरिकी दबाव को सिरे से खारिज कर दिया है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने अमेरिकी व्हाइट हाउस ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो की विवादित टिप्पणियों का करारा जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि भारत “क्रेमलिन का लॉन्ड्रॉमेट” नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत ने अपने सभी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और नियमों का पूरी तरह पालन किया है, जो देश की संप्रभुता और ऊर्जा सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
अमेरिकी दबाव और भारत की ऊर्जा संप्रभुता
मंत्री पुरी ने पीटर नवारो के 'क्रेमलिन का लॉन्ड्रॉमेट' वाले बयान को पूरी तरह से निराधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत अपने ऊर्जा आयात को लेकर किसी भी बाहरी दबाव में नहीं आएगा, क्योंकि यह देश के राष्ट्रीय हित और उसकी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों से जुड़ा मामला है। भारत ने हमेशा ही अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और मानदंडों का सम्मान किया है, और भविष्य में भी ऐसा करना जारी रखेगा।
'द हिंदू' में प्रकाशित अपने लेख में, मंत्री पुरी ने विस्तार से बताया कि रूस से तेल खरीदकर भारत ने किस तरह वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देता, तो कच्चे तेल की कीमतें $200 प्रति बैरल तक पहुंच सकती थीं, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा सकता था। यह निर्णय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी अहम है।
पुरी ने उन आलोचकों को भी जवाब दिया जो भारत को रूसी तेल के लिए 'लॉन्ड्रॉमेट' कहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर एक ट्रांजैक्शन कानूनी शिपिंग, इंश्योरेंस और पूरी तरह से ऑडिटेड चैनलों के माध्यम से हुआ है। यह पारदर्शिता और जवाबदेही भारत की व्यापारिक नैतिकता का प्रमाण है, और किसी भी अनुचित आरोप को सिरे से खारिज करता है। अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार और भारतीय अर्थव्यवस्था
व्हाइट हाउस ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने आरोप लगाया था कि भारतीय रिफाइनरियां सस्ते रूसी तेल खरीदकर उसे यूरोप, अफ्रीका और एशिया में ऊंचे दाम पर बेच रही हैं। इन आरोपों ने भारत की व्यापारिक नीतियों पर सवाल उठाए, जो भारत के ऊर्जा सुरक्षा हितों के विपरीत थे। यह बयान भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने जैसा प्रतीत होता है।
नवारो ने 50% टैरिफ का भी समर्थन किया, जिसमें 25% व्यापारिक अनुचितता और 25% राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर आधारित थे। इस तरह के दंडात्मक उपाय, यदि लागू किए जाते, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते थे, और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा कर सकते थे। भारत की दूरदर्शी ऊर्जा रणनीति और वैश्विक प्रभाव, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के रूसी तेल आयात में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां यह कुल आयात का सिर्फ 1% था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 40% हो गया है। इस रणनीतिक खरीद से भारत ने अनुमानित रूप से करीब $17 अरब की बचत की है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण लाभ है।
हालांकि, अमेरिकी टैरिफ्स के चलते भारतीय निर्यात में 40% तक की कमी आ सकती है, जो एक चिंता का विषय है। मंत्री पुरी ने ऊर्जा सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया और बताया कि भारत ने अब 40 विभिन्न देशों से तेल आयात के विकल्प विकसित किए हैं, जिससे किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम हो सके। यह नीति भारत को भू-राजनीतिक दबावों से बचाने में मदद करती है।
उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यदि रूस से तेल की आपूर्ति वैश्विक बाजार से हटाई जाती है, तो वैश्विक तेल कीमतें $130-140 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। यह स्थिति विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है, और भारत की ऊर्जा नीति की दूरदर्शिता को और पुष्ट करती है।
यूरोपीय बाज़ारों में भारतीय तेल की बढ़ती मांग
पेट्रोलियम मंत्री ने बताया कि भारत दशकों से दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक रहा है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात और मार्जिन में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की निर्यात नीति लगातार स्थिर रही है।
यह जानकर आश्चर्य होता है कि रूस पर यूरोपीय देशों की अपनी पाबंदियों के बावजूद, अब यूरोप भी भारत से पेट्रोलियम उत्पाद खरीद रहा है। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनीति के 'दोहरे मापदंड' को उजागर करती है, जहां कुछ देश अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिबंधों की व्याख्या करते हैं, जबकि अन्य को अनावश्यक दबाव का सामना करना पड़ता है।
राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: भारत का दृढ़ संकल्प : भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति केवल उसके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई है, और वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। यह भारत की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता का एक स्पष्ट संदेश है, जिसे वैश्विक मंच पर मजबूती से रखा गया है।
भारत ने अमेरिकी 'दोहरे मापदंड' पर भी सवाल उठाए हैं, क्योंकि कई अन्य बड़े देश भी रूस के साथ अपना व्यापार जारी रखे हुए हैं। यह विरोधाभास वैश्विक व्यापार और कूटनीति की जटिलताओं को दर्शाता है, जहां भारत को अनुचित रूप से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य देशों को छूट दी जा रही है।
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